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अत्याचार के मामले में पुलिस के कर्तव्य
 

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण ) नियमावली 1995 का नियम-5

पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को सूचना मिलने पर अविलम्ब प्रथिमिकी दर्ज करने का कर्तव्य:

(1) अधिनियम के अधीन किए जाने वाले अपराध से संबंधित सूचना यदि पुलिस थाने के भारसाधक किसी अधिकारी को मौखिक रुप से दी जाती है तो उसके द्वारा या उसके निर्देश से वह लेखबद्ध कर ली जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना चाहे लिखित में दी जाती है या यथापूर्वोक्त लेखबद्ध की जाती है, इसे देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित की जाएगी और उसके सार को उस पुलिस थाने द्वारा रखी जाने वाली पुस्तिका में प्रविष्ट किया जाएगा ।

(2) उपर्युक्त उप-नियम (1) के अधीन इस प्रकार लेखबद्ध की गई सूचना की एक प्रति सूचना देने वाले को तत्काल मुफ्त दी जाएगी ।

(3) उप-नियम (1) में निर्दिष्ट सूचना को लेखबद्ध करने से पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी की ओर से इनकार होने से व्यथित कोई व्यक्ति, इस प्रकार की सूचना का सार लिखित रुप में डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है जो स्वयं अपने द्वारा या पुलिस उप अधीक्षक की कोटि से अन्यून पंक्ति के एक पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण के पश्चात् उस सूचना के सार को उस पुलिस थाने के द्वारा रखी जाने वाली पुस्तिका में प्रविष्ट किए जाने के लिए लिखित रुप में एक आदेश, संबंधित पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को देगा ।

नियम-6 : अधिकारियों द्वारा स्थल का निरीक्षण करने का कर्तव्य:

(1) जब कभी जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट या अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारी जो पुलिस उप-अधीक्षक से कम की पंक्ति का न हो, किसी व्यक्ति से अथवा अपनी ही जानकारी से सूचना प्राप्त करता है कि उसकी अधिकारिता के भीतर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर अत्याचार किया गया है तो तुरन्त वह अत्याचार से हुई जीवन हानि, सम्पत्ति हानि और नुकसान की सीमा को निर्धारण करने के लिए स्वयं घटना स्थल पर जाएगा और राज्य सरकार को तत्काल एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।

(2) जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट अथवा कोई अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक/पुलिस उप अधीक्षक उस स्थान या क्षेत्र का निरीक्षण करने के बाद उस स्थल पर-

(क) राहत के हकदार पीडि़तों, उनके कुटुम्ब के सदस्यों और आश्रितों की एक सूची बनाएगा
(ख) अत्याचार पीडि़तों की सम्पत्ति की हानि और नुकसान की सीमा की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा
(ग) क्षेत्र में पुलिस की गहन गश्त के आदेश देगा
(घ) साक्षियों और पीडि़तों से सहानुभूति रखने वाले को सुरक्षा प्रदान करने के प्रभावी और आवश्यक उपाय करेगा
(च) पीडि़तों को तत्काल राहत प्रदान करेगा ।

नियम-7 : अन्वेषक अधिकारी द्वारा 30 दिनों के भीतर अत्याचार काण्ड का अन्वेषण पूर्ण करने का कर्तव्य

(1) अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध का अन्वेषण ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा किया जाएगा जो पुलिस उप-अधीक्षक के रैंक से कम का न हो । अन्वेषक अधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार/पुलिस अधीक्षक द्वारा उसके पूर्व अनुभव मामले की विवक्षाओं को समझने और मामले का अन्वेषण सही दिशा में कम से कम समय के भीतर करने की योग्यता और न्याय की भावना को ध्यान में रखकर की जाएगी (संप्रति, राज्य सरकार द्वारा सहायक और निरीक्षक कोटि तक के पुलिस अधिकारी को अन्वेषण करने का अधिकार प्रद्दत कर दिया गया है)

(2) उप-नियम (1) के अधीन इस प्रकार नियुक्त अन्वेषक अधिकारी अन्वेषण उच्च प्राथमिकता पर तीस दिन के भीतर पूरा करेगा और पुलिस अधीक्षक को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जो उसके पश्चात् उसे उस राज्य सरकार के पुलिस महानिदेशक को तत्काल भेज देगा ।

नियम-12 : घटना-स्थल का भ्रमण और निरीक्षण तथा अन्य कर्तव्य

(1) जीवन हानि और सम्पत्ति के हुए नुकसान का निर्धारण करने और राहत के लिए पीडि़त व्यक्तियों उनके कुटुम्ब के सदस्यों और आश्रितों की एक सूची तैयार करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट तथा पुलिस अधीक्षक उस स्थान या क्षेत्र में जाएगें जहां अत्याचार किया गया है ।

(2) पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रथम इतिला रिपोर्ट संबंधित पुलिस थाने की बही में रजिस्ट्रीकृत की गई है और अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए है ।

(3) पुलिस अधीक्षक, मौके पर निरीक्षण के पश्चात् तत्काल एक अन्वेषण अधिकारी नियुक्त करेगा और उस क्षेत्र में ऐसा पुलिस बल तैनात करेगा और ऐसे अन्य निवारक उपाय करेगा जिन्हें वह उचित और आवश्यक समझे ।


नियम-8 : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संरक्षण कक्ष के माध्यम से कतिपय करणीय कर्तव्य:

(1) राज्य सरकार, पुलिस महानिदेशक/पुलिस महानिरीक्षक के भारसाधन में एक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संरक्षण कक्ष की स्थापना करेगी । यह कक्ष निम्नलिखित कार्य करने के लिए उत्तरदायी होगा-

(क ) परिलक्षित क्षेत्र का सर्वेक्षण करना
(ख) परिलक्षित क्षेत्र में लोक व्यवस्था और प्रशांति बनाए रखना
(ग) परिलक्षित क्षेत्र में विशेष पुलिस बल तैनात करने के लिए या विशेष पुलिस चौकी की स्थापना के लिए राज्य सरकार को सिफारिश करना
(घ) अधिनियम के अधीन अपराध होने के सम्भावित कारणों को बारे में अन्वेषण करना
(च) अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों में सुरक्षा की भावना को लाना
(छ) परिलक्षित क्षेत्र में विधि व्यवस्था की स्थिति के बारे में नोडल अधिकारी और विशेष अधिकारी को सूचित करना
(ज) विभिन्न अधिकारियों द्वारा किए गए अन्वेषण और स्थल पर किए गए निरीक्षणों के बारे में पूछताछ करना
(झ) नियम 5 के उप-नियम (3) के अधीन उन मामलों में यहां पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा उस थाने में रखी जाने वाली पुस्तिका में प्रविष्टि करने से इनकार किया है, पुलिस अधीक्षक द्वारा की गई कार्रवाई के बारे में पूछताछ करना
(ट) किसी व्यक्ति के लोक सेवक होते हुए जानबूझकर की गई उपेक्षा के बारे में पूछताछ करना
(ठ) अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत मामलों की स्थिति का पुनर्विलोकन करना
(ड) उपर्युक्त के संबंध में राज्य सरकार/नोडल अधिकारी को की गई/की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में एक मासिक रिपोर्ट, प्रत्येक पश्चात्वर्ती मास की 20 तारीख को या उससे पूर्व प्रस्तुत करना.

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण )अधिनियम 1989 के नियम 10 के अधीन अपराध करने की संभावना वाले व्यक्ति को अनुसूचित क्षेत्र या जनजाति क्षेत्र से हटाने, गिरफ्तार करने आदि का प्रस्ताव विशेष न्यायालय को देने का कर्तव्य:
धारा - 10 : ऐसे व्यक्ति को हटाये जाने के लिए विशेष न्यायालय को प्रस्ताव देने का कर्तव्य जिसके द्वारा अपराध किए जाने की संभावना है :

(1) जहां परिवाद या पुलिस रिपोर्ट पर विशेष न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि संभाव्यता है कि कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 244 में यथानिर्दिष्ट अनुसूचित-क्षेत्रों में या ''जनजाति क्षेत्रों'' में सम्मिलित किसी क्षेत्र में, इस अधिनियम के अध्याय 2 के अधीन कोई अपराध करेगा, वहां वह लिखित आदेश द्वारा ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे क्षेत्र की सीमाओं से परे, ऐसे मार्ग से होकर और इतने समय के भीतर हट जाए जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाए और दो वर्ष से अधिक ऐसी अवधि के लिये जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए उस क्षेत्र में जिससे हट जाने का उसे निदेश दिया गया था वापस न लौटे ।

(2) विशेष न्यायालय उप-धारा (1) के अधीन आदेश के साथ उस उपधारा के अधीन निर्दिष्ट व्यक्ति को वे आधार संसूचित करेगा जिस पर वह आदेश किया गया है ।

(3) विशेष न्यायालय, उस व्यक्ति द्वारा, जिसके विरुद्ध ऐसा आदेश किया गया है या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर किये गये अभ्यावेदन पर. ऐसे कारणों से. जो लेखबद्ध किये जायेंगे. उप-धारा (1) के अधीन किये गये आदेश को. प्रतिसंहृत या उपान्तरित कर सकेगा ।

धारा-17 : संभावित अत्याचार के निवारणार्थ "अत्याचार क्षेत्र" घोषित करने की विहित कार्यवाही करने का कर्तव्य :

(1) यदि जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट या किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस अधिकारी को जो पुलिस उप-अधीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, इत्तिला प्राप्त होने पर और ऐसी जांच करने के पश्चात जो वह आवश्ययक समझे, यह विश्वास करने का कारण है कि किसी ऐसे व्यक्ति या ऐसे व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के नहीं है और जो उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी स्थान पर निवास करते है या बार-बार आते-जाते हैं, इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कर सकते है और उसकी यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है तो वह उस क्षेत्र को अत्याचार-ग्रस्त क्षेत्र घोषित कर सकेगा तथा शांति और सदाचार बनाए रखने तथा लोक-व्यवस्था और प्रशांति बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई कर सकेगा और निवारक कार्रवाई कर सकेगा ।

(2) संहिता के अध्याय 8 अध्याय 10 और अध्याय 11 के उपबंध जहां तक हो सके उप-धारा (1) के प्रयोजनों के लिए लागू होंगे ।

(3) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा एक या अधिक स्कीमें वह रीति विनिर्दिष्ट करते हुए बना सकेगी जिससे उप-धारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी, अत्याचारों के निवारण के लिये तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों में सुरक्षा की भावना पुनः लाने के लिये, ऐसी स्कीम या स्कीमों में विनिर्दिष्ट समुचित कर्रवाई करेंगे ।